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Thursday, 30 November 2017

फिर सोने के दुर्ग में, पति बिन कौन उदास-

सच्चे शुभचिंतक रखें, तारागण सा तेज़।
अँधियारे में झट दिखें, रविकर इन्हें सहेज।।

शीशा सिसकारी भरे, पत्थर खाये भाव।
टकराना हितकर नहीं, बेहतर है अलगाव।।

खोज रहा बाहर मनुज, राहत चैन सुकून।
ताप दाब मधुमेह कफ़, अन्दर करते खून।।

ठोकर खा खा खुद उठा, रविकर बारम्बार।
लोग आज कहते दिखे, बड़ा तजुर्बेकार।।

गुमनामी में ही मिले, अब तो दिली सुकून।
शोहरत पा बेचैन है, रविकर अफलातून।।

सुखकर के पीछे पड़े, जो हितकर को भूल।
खुद को मिटते देखते, वो ही नामाकूल।। ।।

मानव के वश में नहीं, रंग-रूप-आकार।
पर अपने किरदार का, वो खुद जिम्मेदार।।

वाणी कार्य विचार को, दर किनार कर व्यक्ति।।
चेहरे से परिचय करे, हो अन्तत: विरक्ति।।

रविकर जीवन-पुस्तिका, पलटे पृष्ट समाज।
वैसे के वैसे मिले, थे जैसे अल्फ़ाज़।।

 शक्ति समय पैसा नहीं, मिले कभी भी संग।
वृद्ध युवा बालक दिखे, क्रमश: इनसे तंग।।

रविकर जीवन-पुस्तिका, पलटे पृष्ट हजार।
वैसे के वैसे मिले, शब्द-अर्थ हर बार।।

जो गवाह संघर्ष का, मूल्य उसे ही ज्ञात।
प्राप्त सफलता को कहें, अन्य भाग्य की बात।।

चक्की चलती न्याय की, देती घुन भी पीस।
असहनीय होती रही, बुरे वक्त की टीस।

अतिशय ऊँचा लक्ष्य जब, डगर नहीं आसान।
किन्तु डगर तो डग तले, मत डगमगा जवान।।

रुपिया हीरा स्वर्ण से, कौन बने धनवान।
शुभ विचार सद्मित्र से, धनी बने इन्सान।।

रैन बसेरे में रुके, या कोठी का व्यक्ति।
सोना रहे खरीद वे, दिखी गजब आसक्ति।।

सोने का मृग माँगती, जब रविकर पति पास ।
फिर सोने के दुर्ग में, पति बिन कौन उदास।।

गुड्डी उड़ी गुमान में, माँझे को दुत्कार |
लिए लुटेरे लग्गियाँ, दिखे घूटते लार ||||

दुर्जन पे विश्वास से, आधा दुखे शरीर।
सज्जन पे शक ने दिया, पूरे तन की पीर।।

Thursday, 9 November 2017

पर दूसरे की गलतियों पर रह सका वह मौन कब-

जब मैल कानों में भरा, आवाज देना व्यर्थ तब।
आवाज़ कब अपनी सुने, मन में भरा हो मैल जब।
करता नजर-अंदाज खुद की गलतियाँ रख पीठ पे-
पर दूसरे की गलतियों पर रह सका वह मौन कब।।

Monday, 6 November 2017

यद्यपि सहारे बिन जिया वह लाश के ही भेष में-


जिंदा मिला तो मारते, हम सर्प चूहा देश में।

लेकिन उसी को पूजते, पत्थर शिला के वेश में।
कंधा दिया जब लाश को तो प्राप्त करते पुण्य हम
यद्यपि सहारे बिन जिया वह लाश के ही भेष में।।



खिचड़ी

हुआ गीला अगर आटा, गरीबी खूब खलती है।
करो मत बन्धुवर गलती, नहीं जब दाल गलती है।
लफंगे देश दुनिया के सदा खिचड़ी पकाते हैं।
स्वयं का पेट भरते किन्तु, जनता हाथ मलती है।।

जुताई में बुवाई में सिंचाई में निराई में।
लगे दो माह पकने में, कटाई में पिटाई में।
कड़ी मेहनत समर्पण से मिले फिर अन्न के दाने।
कटोरा भर मगर जूठन रहे झट फेंक बेगाने।।


तुम रंग गिरगिट सा बदलना छोड़ दो।
परिपक्व फल सा रंग बदलो अब जरा।
जैसे नरम स्वादिष्ट मीठा फल हुआ।
वैसे मधुरता नम्रता विश्वास ला ।।


परिंदा यह बड़ा जिद्दी, बहुत सी ख्वाहिशें ढोये।
रहा नित खोजता मरहम, मगर गम लीलकर सोये।
सदा उम्मीद पर जिंदा, परिंदा किन्तु शर्मिन्दा
कतरती पंख उम्मीदें, प्रियतमा कैंचियाँ धोये।।


पहेली

पढ़ाये पाठ पहले गुरु, परीक्षा बाद में लेता।
सफलता प्राप्त कर चेला, प्रकट आभार कर देता।
महागुरु है मगर वह तो, परीक्षा ले रहा पहले,
सिखाता पाठ फिर पीछे, मनुज-मन मार से दहले।।

समस्यायें सुनाते भक्त दुखड़ा रोज गाते हैं-

प्रवंचक दे रहे प्रवचन सुने सब अक्ल के अंधे।
बड़े उद्योग में शामिल हुये अब धर्म के धंधे।।

अगर जीवन मरण भगवान के ही हाथ में बाबा।
सुरक्षा जेड श्रेणी की चले क्यों साथ में बाबा।
हमेशा मोह माया छोड़ना रविकर सिखाते जब
बना क्यों पुत्र को वारिस बिठाते माथ पे बाबा।।

समस्यायें सुनाते भक्त दुखड़ा रोज गाते हैं।
समझ भगवान बाबा को सदा दरबार आते हैं।
मगर जब रेप का आरोप बाबा पर लगे रविकर
वकीलों की बड़ी सी फौज तब बाबा बुलाते हैं।।

पड़ा बीमार जब वह भक्त पूजा-पाठ करवाये।
दुआ-ताबीज़ बाबा की मगर कुछ काम ना आये।
तबीयत किन्तु बाबा की जरा नासाज क्या होती
दुआयें भक्त तो करते, चिकित्सक किन्तु बुलवाये।।

Monday, 30 October 2017

तलाशे घूर में रोटी, गरीबी व्यस्त रोजी में।-

तलाशे घूर में रोटी, गरीबी व्यस्त रोजी में।
अमीरी दूर से ताके डुबा कर रोटियाँ घी में।
प्रकट आभार प्रभु का कर, धनी वो हाथ फिर जोड़े।
गरीबी वाकई रविकर, कहीं का भी नहीं छोड़े।।

विचरते एक पागल को गरीबी दूर से ताकी।
कई पागल पड़े पीछे, बड़े बूढ़े नहीं बाकी।
प्रकट आभार प्रभु का कर, गरीबी फिर व्यथित होकर ।
कहे प्रभु से मुझे पागल बनाना मत कभी प्रभुवर।

गया पागल दवाखाने विविध रोगी वहाँ दीखें।
विविध बीमारियाँ घेरे, सुनाई पड़ रही चीखें।
ठिकाने होश आ जाते, कृपा प्रभु जी तुम्हारी है।
नहीं असहाय रोगी मैं, बड़ी शेखी बघारी है।

दिखी इक लाश ट्राली पर, नहीं बीमार घबराया ।
प्रकट आभार प्रभु का कर, मिली थी जो दवा खाया।
बड़े विश्वास से कहता, अभी तो आस बाकी है।
महज बीमार ही तो हूँ, अभी तो साँस बाकी है।

Sunday, 15 October 2017

मुक्तक

जद्दोजहद करती रही यह जिंदगी हरदिन मगर।
ना नींद ना कोई जरूरत पूर्ण होती मित्रवर।
अब खत्म होती हर जरूरत, नींद तेरा शुक्रिया
यह नींद टूटेगी नहीं, री जिंदगी तू मौजकर।।

व्यवहार घर का शुभ कलश, इंसानियत घर की तिजोरी।
मीठी जुबाँ धन-संपदा, तो शांति लक्ष्मी मातु मोरी।
पैसा सदा मेहमान सा, तो एकता ममता सरीखी।
शोभा व्यवस्था से दिखे , हल से खुशी क्या खूब दीखी।

कभी क्या वक्त रुकता है, घड़ी को बंद करने से ।
कभी क्या सत्य छुपता है, अनर्गल झूठ बकने से।
करोगे दान तो थोड़ा, रुपैया खर्च हो जाता।
मगर लक्ष्मी नहीं जाती, अपितु आनन्द-धन आता।।

Tuesday, 26 September 2017

दोहे

दानवीर भरसक भरें, रविकर भिक्षा-पात्र।
करते इच्छा-पात्र पर, किन्तु कोशिशें मात्र।।

भरता भिक्षा-पात्र को, दानी बारम्बार।
लेकिन इच्छा-पात्र पर, दानवीर लाचार।।

है सामाजिक व्यक्ति का, सर्वोत्तम व्यायाम।
आगे झुककर ले उठा, रविकर पतित तमाम।

रखे सुरक्षित जर-जमीं, रविकर हर धनवान।
रक्षा किन्तु जुबान की, कभी नहीं आसान।।