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Thursday, 9 November 2017

पर दूसरे की गलतियों पर रह सका वह मौन कब-

जब मैल कानों में भरा, आवाज देना व्यर्थ तब।
आवाज़ कब अपनी सुने, मन में भरा हो मैल जब।
करता नजर-अंदाज खुद की गलतियाँ रख पीठ पे-
पर दूसरे की गलतियों पर रह सका वह मौन कब।।

Monday, 6 November 2017

यद्यपि सहारे बिन जिया वह लाश के ही भेष में-


जिंदा मिला तो मारते, हम सर्प चूहा देश में।

लेकिन उसी को पूजते, पत्थर शिला के वेश में।
कंधा दिया जब लाश को तो प्राप्त करते पुण्य हम
यद्यपि सहारे बिन जिया वह लाश के ही भेष में।।



खिचड़ी

हुआ गीला अगर आटा, गरीबी खूब खलती है।
करो मत बन्धुवर गलती, नहीं जब दाल गलती है।
लफंगे देश दुनिया के सदा खिचड़ी पकाते हैं।
स्वयं का पेट भरते किन्तु, जनता हाथ मलती है।।

जुताई में बुवाई में सिंचाई में निराई में।
लगे दो माह पकने में, कटाई में पिटाई में।
कड़ी मेहनत समर्पण से मिले फिर अन्न के दाने।
कटोरा भर मगर जूठन रहे झट फेंक बेगाने।।


तुम रंग गिरगिट सा बदलना छोड़ दो।
परिपक्व फल सा रंग बदलो अब जरा।
जैसे नरम स्वादिष्ट मीठा फल हुआ।
वैसे मधुरता नम्रता विश्वास ला ।।


परिंदा यह बड़ा जिद्दी, बहुत सी ख्वाहिशें ढोये।
रहा नित खोजता मरहम, मगर गम लीलकर सोये।
सदा उम्मीद पर जिंदा, परिंदा किन्तु शर्मिन्दा
कतरती पंख उम्मीदें, प्रियतमा कैंचियाँ धोये।।


पहेली

पढ़ाये पाठ पहले गुरु, परीक्षा बाद में लेता।
सफलता प्राप्त कर चेला, प्रकट आभार कर देता।
महागुरु है मगर वह तो, परीक्षा ले रहा पहले,
सिखाता पाठ फिर पीछे, मनुज-मन मार से दहले।।

समस्यायें सुनाते भक्त दुखड़ा रोज गाते हैं-

प्रवंचक दे रहे प्रवचन सुने सब अक्ल के अंधे।
बड़े उद्योग में शामिल हुये अब धर्म के धंधे।।

अगर जीवन मरण भगवान के ही हाथ में बाबा।
सुरक्षा जेड श्रेणी की चले क्यों साथ में बाबा।
हमेशा मोह माया छोड़ना रविकर सिखाते जब
बना क्यों पुत्र को वारिस बिठाते माथ पे बाबा।।

समस्यायें सुनाते भक्त दुखड़ा रोज गाते हैं।
समझ भगवान बाबा को सदा दरबार आते हैं।
मगर जब रेप का आरोप बाबा पर लगे रविकर
वकीलों की बड़ी सी फौज तब बाबा बुलाते हैं।।

पड़ा बीमार जब वह भक्त पूजा-पाठ करवाये।
दुआ-ताबीज़ बाबा की मगर कुछ काम ना आये।
तबीयत किन्तु बाबा की जरा नासाज क्या होती
दुआयें भक्त तो करते, चिकित्सक किन्तु बुलवाये।।

Monday, 30 October 2017

तलाशे घूर में रोटी, गरीबी व्यस्त रोजी में।-

तलाशे घूर में रोटी, गरीबी व्यस्त रोजी में।
अमीरी दूर से ताके डुबा कर रोटियाँ घी में।
प्रकट आभार प्रभु का कर, धनी वो हाथ फिर जोड़े।
गरीबी वाकई रविकर, कहीं का भी नहीं छोड़े।।

विचरते एक पागल को गरीबी दूर से ताकी।
कई पागल पड़े पीछे, बड़े बूढ़े नहीं बाकी।
प्रकट आभार प्रभु का कर, गरीबी फिर व्यथित होकर ।
कहे प्रभु से मुझे पागल बनाना मत कभी प्रभुवर।

गया पागल दवाखाने विविध रोगी वहाँ दीखें।
विविध बीमारियाँ घेरे, सुनाई पड़ रही चीखें।
ठिकाने होश आ जाते, कृपा प्रभु जी तुम्हारी है।
नहीं असहाय रोगी मैं, बड़ी शेखी बघारी है।

दिखी इक लाश ट्राली पर, नहीं बीमार घबराया ।
प्रकट आभार प्रभु का कर, मिली थी जो दवा खाया।
बड़े विश्वास से कहता, अभी तो आस बाकी है।
महज बीमार ही तो हूँ, अभी तो साँस बाकी है।

Sunday, 15 October 2017

मुक्तक

जद्दोजहद करती रही यह जिंदगी हरदिन मगर।
ना नींद ना कोई जरूरत पूर्ण होती मित्रवर।
अब खत्म होती हर जरूरत, नींद तेरा शुक्रिया
यह नींद टूटेगी नहीं, री जिंदगी तू मौजकर।।

व्यवहार घर का शुभ कलश, इंसानियत घर की तिजोरी।
मीठी जुबाँ धन-संपदा, तो शांति लक्ष्मी मातु मोरी।
पैसा सदा मेहमान सा, तो एकता ममता सरीखी।
शोभा व्यवस्था से दिखे , हल से खुशी क्या खूब दीखी।

कभी क्या वक्त रुकता है, घड़ी को बंद करने से ।
कभी क्या सत्य छुपता है, अनर्गल झूठ बकने से।
करोगे दान तो थोड़ा, रुपैया खर्च हो जाता।
मगर लक्ष्मी नहीं जाती, अपितु आनन्द-धन आता।।

Tuesday, 26 September 2017

दोहे

दानवीर भरसक भरें, रविकर भिक्षा-पात्र।
करते इच्छा-पात्र पर, किन्तु कोशिशें मात्र।।

भरता भिक्षा-पात्र को, दानी बारम्बार।
लेकिन इच्छा-पात्र पर, दानवीर लाचार।।

है सामाजिक व्यक्ति का, सर्वोत्तम व्यायाम।
आगे झुककर ले उठा, रविकर पतित तमाम।

रखे सुरक्षित जर-जमीं, रविकर हर धनवान।
रक्षा किन्तु जुबान की, कभी नहीं आसान।।

Sunday, 17 September 2017

मगर शुभचिंतकों की खुद, करो पहचान तुम प्यारे


बहस माता-पिता गुरु से, नहीं करता कभी रविकर ।
अवज्ञा भी नहीं करता, सुने फटकार भी हँसकर।
कभी भी मूर्ख पागल से नहीं तकरार करता पर-
सुनो हक छीनने वालों, करे संघर्ष बढ़-चढ़ कर।।


किसी की राय से राही पकड़ ले पथ सही रविकर।

मगर मंज़िल नही मिलती, बिना मेहनत किए डटकर।
तुम्हें पहचानते बेशक प्रशंसक, तो बहुत सारे
मगर शुभचिंतकों की खुद, करो पहचान तुम प्यारे।।